रविवार 27 सितंबर 2026 - 22:26
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हुसैन डे’; कर्बला के संदेश, सत्य, न्याय और मानव गरिमा पर विचारपूर्ण चर्चा

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बैतुल्लाह में ‘हुसैन डे’ के नाम से आयोजित कार्यक्रम में इमाम हुसैन (अ.) के जीवन, कर्बला के सत्य और न्याय के संदेश तथा उसकी सार्वभौमिक महत्ता पर उलमा, शिक्षकों, शायरों और छात्रों ने विचारपूर्ण चर्चा की और अपनी श्रद्धा अर्पित की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अलीगढ़/ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बैतुस्सलात में आयोजित ‘हुसैन डे’ की महफिल उस शाम एक ऐसी आध्यात्मिक दुनिया का दृश्य प्रस्तुत कर रही थी, जहां शब्द दीपक थे, शेर खुशबू, भाषण सत्य की आवाज और हुसैन (अ.) का स्मरण दिलों के लिए प्रकाश का मीनार था। इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम की अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग के डॉ. सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने की। उनकी अध्यक्षता में आयोजित यह महफिल मानो कर्बला के उस दीपक को फिर से रोशन करने का प्रयास थी, जिसे सदियों पहले भालों के साए में जलाया गया था और जिसकी रोशनी आज भी मानव विवेक के अंधकार को दूर कर रही है।

कार्यक्रम की शुरुआत मोहम्मद अख्तर की तिलावत-ए-कुरआन से हुई। उनकी भावपूर्ण तिलावत ने महफिल के लिए मानो एक आध्यात्मिक द्वार खोल दिया। इसके बाद छात्रों कामरान हुसैन, मोहम्मद हसन, शायान और विलायत जाफर ने कसीदे पेश करके इमाम हुसैन (अ.) के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। उनकी आवाजों में केवल मधुरता ही नहीं थी, बल्कि नई पीढ़ी के दिलों में जीवित हुसैनियत की वह धड़कन भी थी, जो समय की दूरी से प्रभावित नहीं होती।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हुसैन डे’; कर्बला के संदेश, सत्य, न्याय और मानव गरिमा पर विचारपूर्ण चर्चा

इसके बाद शायरों ने अपनी कल्पना के दीप जलाए। प्रोफेसर महताब हैदर नकवी, डॉ. असगर एजाज क़ायमी, डॉ. अब्बास रज़ा, मौलाना अहमद मजलिसी, मौलाना मुमताज़ अब्बास उफ़क़, काज़िम जारचवी, अली रज़ा असीर, डॉ. महताब अहमद, दानिश ज़ैदी और अहमद काज़मी ने इमाम हुसैन (अ.) की बारगाह में अपने अशआर का नजराना पेश किया। किसी के शेर में कर्बला धैर्य के विशाल पर्वत के रूप में उभरी, किसी के शब्दों में हुसैन (अ.) सत्य के आकाश के उस चमकते सितारे के रूप में दिखाई दिए, जिसकी रोशनी अंधकार के रेगिस्तानों में भी रास्ता दिखाती है। किसी ने शहादत को वफा के गुलशन की खुशबू बताया और किसी ने हुसैनियत को ऐसी नदी कहा, जो खून से गुजरते हुए मानवता के समुद्र तक पहुंचती है।

कर्बला वास्तव में ऐसी किताब है, जिसके पन्ने खून से लिखे गए, लेकिन जिसका हर शब्द मानवता के लिए प्रकाश बन गया।

कार्यक्रम के वक्ताओं डॉ. मौलाना असगर एजाज क़ायमी, अध्यक्ष, शिया धर्मशास्त्र विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, डॉ. रज़ा अब्बास, डॉ. हैदर हुसैनी, डॉ. शाह मोहम्मद अब्बास वसीम और डॉ. तैयब रज़ा नकवी ने इमाम हुसैन (अ.) के व्यक्तित्व, जीवन, चरित्र और कर्बला के आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभावशाली और विचारपूर्ण भाषण दिए।

डॉ. मौलाना असगर एजाज क़ायमी ने इमाम हुसैन (अ.) के व्यक्तित्व को सत्य, सच्चाई, साहस और मानवीय महानता का आईना बताते हुए कर्बला के संदेश की महत्ता को उजागर किया। उनके भाषण में हुसैनियत केवल इतिहास का एक विषय नहीं, बल्कि अंतरात्मा की वह आवाज बनकर सामने आई, जो हर दौर के इंसान से यह सवाल करती है कि जब सत्य और असत्य आमने-सामने हों तो इंसान किस पक्ष में खड़ा होगा।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हुसैन डे’; कर्बला के संदेश, सत्य, न्याय और मानव गरिमा पर विचारपूर्ण चर्चा

अन्य वक्ताओं ने भी अपने-अपने अंदाज में इमाम हुसैन (अ.) के चरित्र और कर्बला के संदेश को श्रद्धांजलि पेश की। उनके भाषणों में कहीं कर्बला दृढ़ता का पहाड़ थी, कहीं आजादी की सुबह और कहीं मानवीय सम्मान की आखिरी चौकी।

महफिल का विशेष और प्रमुख आकर्षण अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के डॉ. सिद्धार्थ चक्रवर्ती का भाषण था। उन्होंने कर्बला के संबंध में अत्यंत प्रभावशाली और विचारपूर्ण चर्चा की। उनकी बातचीत में कर्बला धार्मिक इतिहास की एक घटना से आगे बढ़कर मानव अंतरात्मा का प्रतीक बन गई। उनके शब्दों ने कर्बला को ऐसे आईने के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें हर युग अपना चेहरा देख सकता है; जहां इंसान को अत्याचार के सामने खामोश रहने और सत्य के लिए दृढ़ता के बीच अपना चुनाव करना पड़ता है।

कर्बला की यही सार्वभौमिकता है कि हुसैन (अ.) का खेमा भले ही रेत के एक मैदान में था, लेकिन उसकी छाया में पूरी मानवता आज भी शरण तलाशती है।

महफिल में हर वक्ता की जुबान से हुसैनियत के अलग-अलग रंग सामने आए। किसी ने हुसैन (अ.) को सत्य की वह अजान बताया, जो सदियों से असत्य के महलों में गूंज रही है। किसी ने उन्हें वफा के आकाश का चांद कहा और किसी ने कर्बला को धैर्य की वह भट्ठी बताया, जहां मानवता का चरित्र कुंदन बनकर निकला।

हुसैनियत वास्तव में तलवार की धार पर लिखी वह इबारत है, जिसे खून ने मिटने नहीं दिया। हुसैन (अ.) वह दीपक हैं, जिसे बुझाने के लिए पूरा लश्कर आया था, लेकिन हवा ने दीपक बुझाने के बजाय उसकी रोशनी को दुनिया के हर कोने तक पहुंचा दिया। हुसैनियत वह यात्रा है, जिसमें मंजिल केवल कर्बला नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, स्वतंत्रता, वफा और मानव गरिमा है।

कार्यक्रम का संचालन मौलाना अहमद मजलिसी ने अत्यंत शालीनता, सहजता और साहित्यिक सुंदरता के साथ किया। उनके संचालन ने महफिल के सभी रंगों—तिलावत, कसीदे, अशआर और भाषणों—को एक सुंदर माला में पिरोए रखा।

अंत में प्रोफेसर तैयब रज़ा नकवी ने सभी वक्ताओं, शायरों, छात्रों, शिक्षकों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। महफिल में छात्रों और श्रोताओं की बड़ी संख्या ने भाग लिया और बैतुस्सलात का वातावरण इमाम हुसैन (अ.) के स्मरण, अहलेबैत (अ.) की मोहब्बत और कर्बला की सोच से भर गया। कार्यक्रम के बाद प्रतिभागियों के लिए अच्छे रात्रिभोज का भी आयोजन किया गया, जिसने इस यादगार शाम को और सुखद बना दिया।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हुसैन डे’; कर्बला के संदेश, सत्य, न्याय और मानव गरिमा पर विचारपूर्ण चर्चा

इस तरह ‘हुसैन डे’ केवल एक कार्यक्रम बनकर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि ऐसी शाम बन गया, जिसके बाद भी उसके दीप दिलों में जलते रहे।

कर्बला गुजर गई, लेकिन कर्बला की रोशनी नहीं गुजरी;

हुसैन (अ.) शहीद हुए, लेकिन हुसैनियत शहीद नहीं हुई;

और यही वह रहस्य है कि हर दौर के अंधकार के सामने

कर्बला आज भी एक रोशन दीपक बनकर खड़ी है।

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